Monday, February 25, 2019

इंतजार

कविता लिखकर हर बार
मैंने तुमको सुनाने का इंतजार किया
तुमने कहा - 'समय नहीं है'

फिर मैंने पत्तों को सुनाई कविता
उस बरस वसंत में बहुत फूल आये!

अब फूलों को तुम्हारा इंतजार है
मैं जानता हूँ तुम्हारे पास समय नहीं है!

Thursday, August 11, 2016

निशा तुम्हारा तो वादा था,
जब भी सूरज ढलेगा
तुम आओगी.
और मैं कहता था
तुम आओ न आओ,
तेरी याद जरूर आएगी.
लेकिन कल जब सूरज ढला
और तुम नहीं आई.
तम में डूबा मेरा ये नगर,
खोजता था तेरा शहर.
और फिर यादों का
वो अंतहीन सफर.

निशा तुम्हारा तो वादा था न!

नगर के तम में मैं हूँ,
चांदनी रात में मैं हूँ,
जरा देखो तो
तेरे चारों ओर मैं हूँ,
क्यों खोजते हो शहर,
तुम्हारे अंदर भी मैं हूँ,
आँखें बंद करो,
क्या चिदाकाश में वो तम नहीं है?
बुद्ध बने तो चांदनी दिखेगी.
तम में, चांदनी में,
सिर्फ तुम्हारी निशा.
चहुँ ओर तेरी निशा.

निशा का वादा था न!

काली घटा जब छाती है
निशा तेरी याद आती है
तेरे होने का गुमान है या
प्यार का एक जमाना है
आँखों में अँधेरा छाना है
निशा तेरी याद आना है  
तम को एकदिन ठहर जाना है
मुझे तुझमे खो जाना है

निशा तुमसे ये वादा है!

कल जब तुम खो जाओगे
और मेरे हो जाओगे.
मैं तो तेरी, तेरी ही रही
मुझे खो के कहाँ जाना है
जो तेरे सिवा कही खोयी ही नहीं
उसे खो के कहाँ जाना है

निशा का तुमसे वादा है!

Wednesday, August 6, 2014

तुम जो आये नहीं 
पीले फूल कास के 
फिर भी मुरझाये नहीं 

इस कोमल कुसुम की
अदम्य साहस तो देखिये
पंखुड़ी पे जो ओस जमे थे 
शाम तक ढल पाये नहीं 

तुम जो आये नहीं.... 

नव वृन्त भी डाली पे
श्रृंगार रस में डूब चुकी
बेला कब की बीत चुकी
वसंत अभी तक आये नहीं

तुम जो आये नहीं .....

प्रतीक्षा में विह्वलता से
पथ में खड़े थे बन पराग
तुफानो का दौर चला
पर मंजर बदल पाये नहीं

तुम जो आये नहीं.....

संवेदना ही मनुज को
मनुज सा बनाती है
एकाकीपन तो जन्मो से,
उर से प्रेम मिट पाये नहीं

तुम जो आये नहीं ....
जीना है और फिर खो जाना है, 
तेरी कहानी और क्या होना है!

चन्द सांसो की ये जिंदगी
घुट घुट के यहाँ क्या रोना है
जाना ही है तो इतना हसना 
मौत को भी उस दिन शर्माना है 

जीना है और फिर खो जाना है, 
तेरी कहानी और क्या होना है!
मेरे प्रेम
--------

मैं तुम्हारे खत को छुपाता रहा 
शहर से नजरें बचाता रहा 

लोगों में कम से कम यकीं तो था 
तुम्हे भी मुझसे कभी प्यार था 

मेरे प्यार का शायद यही अंजाम था 
तेरा खत बिलकुल सरेआम था

नम आँखे लिए पूरा बाजार था
तुम्हे मुझसे कभी "न" प्यार था

हश्र प्रेमी का एक दिन होना ही था
बीच सेहरा मेरा सुना मजार था

खत पढ़ते रहे, लोग आते रहे
सुना मजार मेरा आज जार जार था

आह भरते रहे, फूल चढ़ते रहे
तेरे फिकरे का बस इक इन्तजार था

---------------------------अमित कुमार २०-०६-२०१४

Sunday, May 25, 2014

Yamini

यामिनी तुम रुक जाओ वही
की पथिक अभी चलता है
ललित लालसाओं का ये पथ
अभी बहुत लम्बा है

अंतहीन पथ का उद्गम
किसी शुन्य से होता है
मृगतृष्णा में यायावर होना
मनुज वृत्ति होता है

अनवरत ही चलते रहना
पथिक का कर्म नहीं है?
इक्क्षाओं की पूर्ति करना
पिता का धर्म नहीं है ?

छोटी सी ये बात तुम्हारे
समझ से क्यों परे है
अलसाया सा सूरज भी
ढलता नदी तीरे है

हे, यामिनी तुम रुक जाओ वही!

शाम को आना, सबेरे जाना
यही मेरी नियति है
मैं निशा हूँ, तम में रहना
यही मेरी वृत्ति है

स्वपन नगरी भी आती है
जब खोती कहीं चेतना है
स्वपन बिना कोई क्या पाता
नासमझ, यही वेदना है

कामनाओं को पा लेने से
क्या बनता कोई पुरंदर है
जीवन के अंत में आता
लेने कोई अंतक है

मैंने कब रोक है किसको
सत्य किसने जाना है
परमता को पा लेना ही
पथ पर रुक जाना है

हे, पथिक तुम रुक जाओ वही!

Tuesday, March 25, 2014

I Love You!!

फिर किसी रहगुज़ार पे शायद
हम कभी मिल सके मगर शायद
जिंदगी भर लहू रुलाएगी
यादें याराने बेखबर शायद
जिनके हम मुन्तजिर रहे उनको
मिल गए और हमसफ़र शायद
जान पहचान से भी क्या होगा
फिर भी ऐ दोस्त गौर कर शायद