निशा तुम्हारा तो वादा था,
जब भी सूरज ढलेगा
तुम आओगी.
और मैं कहता था
तुम आओ न आओ,
तेरी याद जरूर आएगी.
लेकिन कल जब सूरज ढला
और तुम नहीं आई.
तम में डूबा मेरा ये नगर,
खोजता था तेरा शहर.
और फिर यादों का
वो अंतहीन सफर.
निशा तुम्हारा तो वादा था न!
नगर के तम में मैं हूँ,
चांदनी रात में मैं हूँ,
जरा देखो तो
तेरे चारों ओर मैं हूँ,
क्यों खोजते हो शहर,
तुम्हारे अंदर भी मैं हूँ,
आँखें बंद करो,
क्या चिदाकाश में वो तम नहीं है?
बुद्ध बने तो चांदनी दिखेगी.
तम में, चांदनी में,
सिर्फ तुम्हारी निशा.
चहुँ ओर तेरी निशा.
निशा का वादा था न!
काली घटा जब छाती है
निशा तेरी याद आती है
तेरे होने का गुमान है या
प्यार का एक जमाना है
आँखों में अँधेरा छाना है
निशा तेरी याद आना है
तम को एकदिन ठहर जाना है
मुझे तुझमे खो जाना है
निशा तुमसे ये वादा है!
कल जब तुम खो जाओगे
और मेरे हो जाओगे.
मैं तो तेरी, तेरी ही रही
मुझे खो के कहाँ जाना है
जो तेरे सिवा कही खोयी ही नहीं
उसे खो के कहाँ जाना है
निशा का तुमसे वादा है!