Sunday, May 25, 2014

Yamini

यामिनी तुम रुक जाओ वही
की पथिक अभी चलता है
ललित लालसाओं का ये पथ
अभी बहुत लम्बा है

अंतहीन पथ का उद्गम
किसी शुन्य से होता है
मृगतृष्णा में यायावर होना
मनुज वृत्ति होता है

अनवरत ही चलते रहना
पथिक का कर्म नहीं है?
इक्क्षाओं की पूर्ति करना
पिता का धर्म नहीं है ?

छोटी सी ये बात तुम्हारे
समझ से क्यों परे है
अलसाया सा सूरज भी
ढलता नदी तीरे है

हे, यामिनी तुम रुक जाओ वही!

शाम को आना, सबेरे जाना
यही मेरी नियति है
मैं निशा हूँ, तम में रहना
यही मेरी वृत्ति है

स्वपन नगरी भी आती है
जब खोती कहीं चेतना है
स्वपन बिना कोई क्या पाता
नासमझ, यही वेदना है

कामनाओं को पा लेने से
क्या बनता कोई पुरंदर है
जीवन के अंत में आता
लेने कोई अंतक है

मैंने कब रोक है किसको
सत्य किसने जाना है
परमता को पा लेना ही
पथ पर रुक जाना है

हे, पथिक तुम रुक जाओ वही!