infinity
Saturday, January 18, 2014
Parichay!
विस्तृत नभ का कोई कोना,
मेरा न कभी अपना होना,
परिचय इतना, इतिहास यही,
उमड़ी कल थी, मिट आज चली!
मैं नीर भरी दुःख कि बदली !
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