यामिनी तुम रुक जाओ वही
की पथिक अभी चलता है
ललित लालसाओं का ये पथ
अभी बहुत लम्बा है
अंतहीन पथ का उद्गम
किसी शुन्य से होता है
मृगतृष्णा में यायावर होना
मनुज वृत्ति होता है
अनवरत ही चलते रहना
पथिक का कर्म नहीं है?
इक्क्षाओं की पूर्ति करना
पिता का धर्म नहीं है ?
छोटी सी ये बात तुम्हारे
समझ से क्यों परे है
अलसाया सा सूरज भी
ढलता नदी तीरे है
हे, यामिनी तुम रुक जाओ वही!
शाम को आना, सबेरे जाना
यही मेरी नियति है
मैं निशा हूँ, तम में रहना
यही मेरी वृत्ति है
स्वपन नगरी भी आती है
जब खोती कहीं चेतना है
स्वपन बिना कोई क्या पाता
नासमझ, यही वेदना है
कामनाओं को पा लेने से
क्या बनता कोई पुरंदर है
जीवन के अंत में आता
लेने कोई अंतक है
मैंने कब रोक है किसको
सत्य किसने जाना है
परमता को पा लेना ही
पथ पर रुक जाना है
हे, पथिक तुम रुक जाओ वही!
की पथिक अभी चलता है
ललित लालसाओं का ये पथ
अभी बहुत लम्बा है
अंतहीन पथ का उद्गम
किसी शुन्य से होता है
मृगतृष्णा में यायावर होना
मनुज वृत्ति होता है
अनवरत ही चलते रहना
पथिक का कर्म नहीं है?
इक्क्षाओं की पूर्ति करना
पिता का धर्म नहीं है ?
छोटी सी ये बात तुम्हारे
समझ से क्यों परे है
अलसाया सा सूरज भी
ढलता नदी तीरे है
हे, यामिनी तुम रुक जाओ वही!
शाम को आना, सबेरे जाना
यही मेरी नियति है
मैं निशा हूँ, तम में रहना
यही मेरी वृत्ति है
स्वपन नगरी भी आती है
जब खोती कहीं चेतना है
स्वपन बिना कोई क्या पाता
नासमझ, यही वेदना है
कामनाओं को पा लेने से
क्या बनता कोई पुरंदर है
जीवन के अंत में आता
लेने कोई अंतक है
मैंने कब रोक है किसको
सत्य किसने जाना है
परमता को पा लेना ही
पथ पर रुक जाना है
हे, पथिक तुम रुक जाओ वही!
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