Wednesday, August 6, 2014

तुम जो आये नहीं 
पीले फूल कास के 
फिर भी मुरझाये नहीं 

इस कोमल कुसुम की
अदम्य साहस तो देखिये
पंखुड़ी पे जो ओस जमे थे 
शाम तक ढल पाये नहीं 

तुम जो आये नहीं.... 

नव वृन्त भी डाली पे
श्रृंगार रस में डूब चुकी
बेला कब की बीत चुकी
वसंत अभी तक आये नहीं

तुम जो आये नहीं .....

प्रतीक्षा में विह्वलता से
पथ में खड़े थे बन पराग
तुफानो का दौर चला
पर मंजर बदल पाये नहीं

तुम जो आये नहीं.....

संवेदना ही मनुज को
मनुज सा बनाती है
एकाकीपन तो जन्मो से,
उर से प्रेम मिट पाये नहीं

तुम जो आये नहीं ....

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