infinity
Tuesday, December 31, 2013
लम्हों की जागीर लुटा कर बैठे हैं
हम घर की दहलीज़ पे आकर बैठे हैं
लिखने को उन्माद कहाँ से लाऊँ मैं
कागज से एक नाम मिटा कर बैठे हैं
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