Wednesday, April 7, 2010

Experience Of Life

काँटों से गुजर जाना, शोलों से निकल जाना,
फूलों के शहर में जाना तो संभल जाना !

दिन अपना चिरागों के मानिंद गुजार लेना,
हर सुबह को बुझ जाना, हर शाम को जल जाना !

वो शख्श मेरा क्या साथ निभाएगा,
मौसम की तरह जिसने सिखा है बदल जाना !

1 comment:

The Endless Race said...

kitni gahri bat kitni aasani se kah gaye !!!
aati uttam.