Wednesday, May 28, 2008

प्यारी स्नेहा

यह जो जीवन का सफर है,
मिलना बिछड़ना इक खेल है
मिल के हम खुश होते हैं
बिछड़ गए तो गम पाते हैं
यह तो सदियों का फेर है
मिलना बिछड़ना इक खेल है

किसी के दिल का तारा टुटा
अपना सा इक प्यारा छूटा
जानेवालों के लिए रोना क्या
आगंतुक संग हँसाना क्या
यह तो सदियों का फेर है
मिलना बिछड़ना इक खेल है

कविता भी तो कहती है
जो बीत गयी सो बात गयी
वह कौन खडा पथ पे राही
अश्रु नित्य बहाता है
अरे यह तो सदियों का फेर है
मिलना बिछड़ना इक खेल है

तर्कसंगत सी बातों से
बच्चन की कविताओं से
कितना समझाता हूँ मन को
पर स्नेहा मेरी,
भूल के भी नहीं भूल पाता हूँ तुमको

क्या यह जन्मों का फेर है
क्या मिलना हमारा इक खेल है
यह सोच के जी घबराता है
फिर सहसा मन में आता है
अरे यह तो सदियों का फेर है
यहाँ मिलना बिछड़ना इक खेल है

छोटी छोटी सी बातों से
कितना समझाता हूँ मन को
पर स्नेहा मेरी,
भूल के भी नहीं भूल पाता हूँ तुमको

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मित्रों,

इस कविता को पढ़ कर किसी प्रकार की भ्रांति को मन में न पाले. कविता में जो लड़की का नाम है वो काल्पनिक है और इसका वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं है. इसलिए इस निर्दोष बालक के बारे में कृपया कुछ ऐसा वैसा ना सोचे.

6 comments:

Unknown said...

चेहरे बदलने का हुनर मुझमैं नहीं ,
दर्द दिल में हो तो हसँने का हुनर मुझमें नहीं,
मैं तो आईना हुँ तुझसे तुझ जैसी ही मैं बात करू,
टूट कर सँवरने का हुनर मुझमैं नहीं ।

चलते चलते थम जाने का हुनर मुझमैं नहीं,
एक बार मिल के छोड जाने का हुनर मुझमैं नहीं ,
मैं तो दरिया हुँ , बेहता ही रहा ,
तुफान से डर जाने का हुनर मुझमैं नहीं ।

सरहदों में बंट जाने का हुनर मुझमैं नहीं ,
रोशनी में भी दिख पाने का हुनर मुझमैं नहीं ,
मैं तो हवा हुँ , महकती ही रही ,
आशिंयाने मैं रह पाने का हुनर मुझमैं नहीं ।

सुन के दर्द और सताने का हुनर मुझमैं नही ,
धर्म के नाम पर खुन बहाने का हुनर मुझमैं नहीं ,
मैं तो इन्सान हुँ , इन्सान ही रहूँ ,
सब कुछ भुल जाने का हुनर मुझमैं नहीं ।

अपने दम पे जगमगाने हुनर मुझमैं नहीं ,
मैं तो रात को ही दिखुंगा ,दिन में दिख पाने का हुनर मुझमैं नहीं ,
मैं तो चांद हूँ तन्हा ही रहा ,
तारों की तरह साथ रह पाने का हुनर मुझमैं नहीं ।

सुख में खो जाने का हुनर मुझमैं नहीं ,
दुख में घबराने का हुनर मुझमैं नहीं ,
मैं तो जिन्दगी हुँ चलती ही रहुँ ,
व़क़्त साथ छोड जाने हुनर मुझमैं नहीं ।

त़कलीफ में अश्क बहाने का हुनर मुझमैं नहीं ,
दोस्तों के सामने छिप जाने का हुनर मुझमैं नहीं ,
मैं तो एहसास हुँ ,मन में ही बसुं ,
भगवान की तरह पत्थरों में रह पाने का हुनर मुझमैं नहीं ।

1/0 = undefined said...

Wah, Kya baat hai. Mast Poem hai.

Anonymous said...

Hmm too good but hey NIRDOSH BAALAK :-)) This name Sneha is imaginary or the girl too is KAALPNIK jiska jiker hai aapki kavita mein .....Any ways u hv written it beautifully Iss baat pe humari WAH WAH kabool kijiye :-)


2) Nikki ji aap mein to bahut hunner hai :-)) Very nice do keep it up...atti sunder !!

1/0 = undefined said...

What you think Rashmi ji....Thanks for Wah Wah...

Anonymous said...

Beautiful......
Amazing......
waaaaaaaah...
Mind blowing...
mmmmmm ab aur kya kahoon ???
Jo nahi hai uske liye kitna sunder likha hai aapne ...
sochti hoon ki gar hoti to kya hota :-))
AM THINKING WHERE"S SNEHA ???

1/0 = undefined said...

Think Think...She is in Poem and in my heart...What are you doing in US?