Sunday, December 23, 2007

प्रेमरस

तुम कनक किरण के अंतराल में,
लुक छिप कर चलते हो क्यों?

नत मस्तक गर्व वहन करते
यौवन के घन रस कण झरते
हे लाज भरे सौन्दर्य बता दो
मौन बने रहते हो क्यों?

तुम कनक किरण के अंतराल में,
लुक छिप कर चलते हो क्यों?

अधरों के मधुर कगारों में
कल कल ध्वनि के गुन्जारो में
मधु सरिता सी यह हंसी तरल
अपनी पीते रहते हो क्यों?

तुम कनक किरण के अंतराल में,
लुक छिप कर चलते हो क्यों?

बेला विभ्रम की बीत चली
रजनीगंधा की कली खिली
अब सांध्य मलय आकुलीत दुकूल
कलित हो यों छिपते हो क्यों?

तुम कनक किरण के अंतराल में,
लुक छिप कर चलते हो क्यों?

1 comment:

Shubhranshu said...

Have you written this poem ?? It's beautiful!!